पॉलीग्राफ परीक्षण: क्या है और आपको क्या पता होना चाहिए
पॉलीग्राफ परीक्षण, जिसे आमतौर पर 'लाइ डिटेक्टर' कहा जाता है, शरीर की कुछ शारीरिक प्रतिक्रियाओं को रिकॉर्ड करके काम करता है। यह दिल की धड़कन, रक्तचाप, सांस लेने की दर और त्वचा की नमी जैसी चीजें मापता है। सवालों के दौरान इन संकेतों में बदलाव देखकर परीक्षक अंदाज़ा लगाता है कि व्यक्ति सच्चाई बोल रहा है या नहीं।
अगर आप कभी किसी जांच या नौकरी की पृष्ठभूमि जांच में पॉलीग्राफ के बारे में सुनें, तो समझ लें कि यह सीधा-सा झूठ नापने का यंत्र नहीं है — यह एक सहायक उपकरण है। नतीजा हमेशा 100% पक्के नहीं माना जाता।
पॉलीग्राफ कैसे काम करता है?
परीक्षण से पहले परीक्षक आपसे बातचीत करेगा और सवालों की सूची और परीक्षण के तरीके समझाएगा। आम तौर पर तीन चरण होते हैं: प्री‑टेस्ट (तैयारी और सवाल तय करना), टेस्ट (विभिन्न प्रकार के सवाल पूछे जाते हैं) और पोस्ट‑टेस्ट (रिपोर्ट और व्याख्या)।
टेस्ट में कुछ नियंत्रण प्रश्न होते हैं जिनका उद्देश्य सामान्य भावनात्मक प्रतिक्रिया मापना होता है, और कुछ सीधे संबंधित सवाल होते हैं। इन दोनों के बीच अंतर देखकर मशीन संकेत देती है। ध्यान रखें, मशीन संकेतों को रिकॉर्ड करती है; व्याख्या इंसान करता है—इसीलिए परीक्षक की योग्यता अहम है।
सटीकता, कानूनी स्थिति और क्या करें
पॉलीग्राफ की सटीकता पर विशेषज्ञों की राय अलग है। कुछ परिस्थिति और परीक्षक के अनुभव पर निर्भर करते हुए परिणाम 60% से 90% तक बताये जाते हैं। इसलिए कई न्यायालय इसे अकेला सबूत मानते नहीं। भारत में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और प्रथाओं के कारण पॉलीग्राफ के नतीजों को हमेशा निर्णायक प्रमाणीकरण नहीं माना जाता। अक्सर जांच एजेंसियां इसे सुराग के तौर पर इस्तेमाल करती हैं, और अदालत में अन्य सबूतों के साथ जोड़कर देखा जाता है।
अगर आपको टेस्ट के लिए बुलाया गया है तो कुछ सरल बातें याद रखें: इमानदार रहें, टेस्ट से पहले अच्छी नींद लें, शराब या दवाएँ न लें, और परीक्षा वाली जगह पर शांत रहें। आप परीक्षक से पहले प्रश्नों, प्रक्रिया और किसी भी दिक्कत के बारे में सवाल पूछ सकते हैं। अपने अधिकार और सहमति के बारे में स्पष्ट रहें—किसी भी तरह के बलपूर्वक परीक्षण को ठुकराएँ और लिखित में जानकारी माँगें।
अंत में, पॉलीग्राफ एक उपयोगी जांच साधन हो सकता है पर यह आखिरी शब्द नहीं है। नौकरी या कानूनी मामले में इसका उपयोग कैसे होगा, यह आपकी स्थिति और स्थानिय नियमों पर निर्भर करेगा। जब भी जरूरत हो, प्रमाणित और अनुभवी परीक्षक से ही टेस्ट करवाएँ और नतीजे को अन्य सबूतों के साथ ही महत्व दें।
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में पोस्टग्रेजुएट डॉक्टर की बलात्कार और हत्या के प्रमुख संदिग्ध संजय रॉय पर पॉलीग्राफ परीक्षण की अनुमति दी है। पॉलीग्राफ परीक्षण, जिसे झूठ पहचानने वाला परीक्षण भी कहा जाता है, शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापता है ताकि संभावित धोखाधड़ी को पहचान सके। यह परीक्षण रॉय के बयानों की संगति को सत्यापित करने, धोखाधड़ी की पहचान करने और जांच को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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