हिज़बल्ला: क्या है, इसकी ताकत और लेटेस्ट खबरें
हिज़बल्ला एक ऐसा नाम है जो लेबनान, इजरायल और पूरे मध्य-पूर्व की राजनीति में अक्सर सुना जाता है। यह संगठन राजनीतिक पार्टी भी है और सशस्त्र समूह भी — यही इसकी खासियत और जटिलता है। अगर आप जानना चाहते हैं कि हिज़बल्ला का असर देशों पर कैसे पड़ता है और हाल की घटनाएँ क्या संकेत देती हैं, तो यह पृष्ठ आपकी मदद करेगा।
हिज़बल्ला का संक्षिप्त इतिहास
हिज़बल्ला की स्थापना 1980s के शुरूआती दशक में हुई थी, जब लेबनान में सिविल युद्ध और इजरायल के प्रवेश के बाद स्थानीय शिया समुदाय ने जवाबी संगठनों का गठन किया। संगठन का राजनीतिक नेतृत्व सार्वजनिक है और सशस्त्र विंग ने समय-समय पर इजरायल के साथ सैन्य संघर्ष किए। ईरान का समर्थन और सीरिया के साथ गठजोड़ इसे क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावी बनाते हैं।
साल-दर-साल हिज़बल्ला ने सिर्फ युद्ध नहीं लड़ा, बल्कि लेबनान की राजनीति, सामाजिक सेवाएँ और स्थानीय सुरक्षा में भी कदम रखा। इस वजह से कई देशों ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया, जबकि कुछ जगहों पर इसे मुट्ठीभर राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी मिला।
वर्तमान मिसाइल, सैन्य गतिविधि और वैश्विक असर
हाल के वर्षों में हिज़बल्ला की सैन्य क्षमता में सुधार के संकेत मिले हैं—रॉकेट, ड्रोन और सीमा पर छोटी-छोटी भिड़ंत इसकी रणनीति के हिस्से रहे हैं। यह गतिविधियाँ सीधे इजरायल के साथ तनाव बढ़ाती हैं और पूरे क्षेत्र में घुसपैठ, शरणार्थी धक्का और आर्थिक दबाव जैसे नतीजे ला सकती हैं।
विश्व समुदाय पर इसका असर किस तरह पड़ता है? आर्थिक दंड, सैन्य समर्थन की कटौती और राजनयिक दबाव बढ़ते हैं। कुछ देश सुरक्षा कारणों से कड़े कदम उठाते हैं, तो कुछ स्थानों पर राजनीतिक वार्ता जारी रहती है।
क्या हिज़बल्ला भारत के लिए मुद्दा है? सीधे तौर पर भारत पर सैन्य खतरा कम है, लेकिन मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव तेल, व्यापार और वैश्विक सुरक्षा माहौल को प्रभावित कर सकता है। भारतीय नौसेना और विदेश मंत्रालय ऐसी घटनाओं पर नज़दीकी नजर रखते हैं।
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मंगलवार को इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में हिज़्बुल्ला के ठिकानों पर हवाई हमलों को जारी रखा, जबकि इस्लामिक संगठन ने उत्तरी इजरायल पर रॉकेट दागे। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेहझेकीयन ने हिज़्बुल्ला को समर्थन देने की बात कही, वहीं यूरोपीय नेताओं ने इसे 'सम्पूर्ण युद्ध' के कगार पर बताया।
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